पर्वत हिमालय हमारा

पर्वत हिमालय हमारा "कितनी सदिया बीत चुकी है। एक जगह खड़ा हिमालय रखवाली का वचन निभाए, कर्तव्यों की कथा सुनाए । अविचल और अडिग रहकर नित, मुश्कानो के कोष लुटाए। भारत माता के मस्तक पर

कौन

कौनइतने उचे नील गगन में ,तारो को चमकाता कौन?साँझ सवेरे पूर्व दिशा में,सूरज चाँद उगाता कौन?ये पर्वत ये नदियाँ-सागर ,किसने यहाँ बनाए हैवृक्ष लताए –पौधे सुंदरकिसने यहाँ उगाए है?कौन बहाता

मधुशाला

मधुशाला -किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हालाकिसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला,किसी ओर मैं देखूं, मुझको दिखलाई देता साकीकिसी ओर देखूं, दिखलाई पड़ती मुझको मधुशाला-हरिवंश राय

रतनारी हो थारी आँखड़ियाँ

रतनारी हो थारी आँखड़ियाँरतनारी हो थारी आँखड़ियाँ।प्रेम छकी रसबस अलसाड़ी, जाणे कमलकी पाँखड़ियाँ॥सुंदर रूप लुभाई गति मति, हो गईं ज्यूँ मधु माँखड़ियाँ।रसिक बिहारी वारी प्यारी, कौन बसी निस काँखड़ियाँ॥-बिहारी

मिट्टी में रस

तोड़ो तोड़ो तोड़ो ये पत्थर ये चट्टानें ये झूठे बंधन टूटें तो धरती को हम जानें सुनते हैं मिट्टी में रस है जिससे उगती दूब है अपने मन के मैदानों पर व्यापी कैसी ऊब है आधे

मधुर मधु-सौरभ जगत्

मधुर मधु-सौरभ जगत् कोमधुर मधु-सौरभ जगत् को स्वप्न में बेसुध बनाता वात विहगों के विपिन के गीत आता गुनगुनाता !मैं पथिक हूँ श्रांत, कोई पथ प्रदर्शक भी न मेरा ! चाहता अब

मुझे फूल मत मारो

मुझे फूल मत मारोमुझे फूल मत मारो, मैं अबला बाला वियोगिनी, कुछ तो दया विचारो।होकर मधु के मीत मदन, पटु, तुम कटु गरल न गारो, मुझे विकलता, तुम्हें विफलता, ठहरो, श्रम परिहारो।नही