रक्षा बंधन (राखी) का त्योहार

Raksha Bandhan

वैसे तो भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है , यहां समय समय पर बहुत से त्योहार मनाए जाते हैं । ऐसा ही एक त्योहार है रक्षाबंधन जिसे भाई-बहन के प्रेम के प्रतीक के तौर पर मनाया जाता है।  रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है । इस दिन बहनें अपने भाईयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनकी लंबी आयु की कामना करती हैं और भाई भी अपनी बहन की हमेशा रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। इस दौरान घर में पूजा-पाठ और हवन के कार्यक्रम भी होते हैं । रक्षाबंधन के दिन दान का विशेष महत्त्व माना गया है । इस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है तथा दान-दक्षिणा भी दी जाती है ।

रक्षा बंधन के दिन को गुरु-शिष्य परंपरा के प्रतीक के रूप में भी मानया जाता है । शास्त्रों के अनुसार श्रावण के महीने में सभी ऋषिगण आश्रम में यज्ञ करते थे और श्रावण-पूर्णिमा को यज्ञ की पूर्णाहुति होती थी। यज्ञ जब ख़त्म हो जाता था तब आश्रम के ऋषि अपने शिष्यों को रक्षा-सूत्र बाँधते थे और उनकी रक्षा के लिए मंत्र पढ़ा करते थे। पहले इसे रक्षा-सूत्र के नाम से जाना जाता था लेकिन अब इसे राखी कहा जाने लगा है।

आज भी कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधते हुए ब्राह्मण इस मंत्र का उच्चारण जरुर करते हैं

                       येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।

                       तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।

इस मंत्र का अर्थ है – रक्षा के जिस सूत्र (राखी)  से अतिबली राक्षसराज बली को बाँधा गया था, उसी से मैं तुम्हें बाँधता हूँ ।

हे रक्षासूत्र तूम भी इसकी सब प्रकार से रक्षा करना।

युधिष्ठिर को भगवान कृष्ण ने सुनाई रक्षा सूत्र बांधे जाने के पीछे की ये कथा

shri krishana

युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से प्रश्न पूछा की – ‘हे अच्युत! मुझे रक्षा बंधन की वह कथा सुनाइए जिससे मनुष्यों के सारे संकट टल जाते हैं। तब भगवान कृष्ण ने कथा सुनाई कि – हे पांडव श्रेष्ठ! एक बार देवताओं तथा असुरों में युद्ध हुआ यह युद्ध लगातार बारह वर्षों तक चलता रहा। असुरों ने देवताओं को पराजित कर दिया जिसमें देवता इंद्र भी पराजित हो चुके थे।

ऐसी स्थिति में सभी देवगण और इंद्र अमरावती चले गए। दैत्यराज ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया और सभी को ये कह दिया की सब लोग उसकी ही पूजा करे किसी और देवता की न करे, दैत्यराज की इस आज्ञा से यज्ञ पूजा-पाठ तथा उत्सव आदि सब बंद हो गए। सत्य और धर्म का नाश होने लगा जिससे  देवता कमजोर पड़ने लगे। तब इंद्र अपने गुरु बृहस्पति के पास गए तथा उनके चरणों को पकड़ कर कहने लगे कि – हे गुरुवर! ऐसी दशा है कि मुझे यहीं प्राण देने होंगे। न तो मैं भाग सकता हूं और न ही युद्धभूमि में युद्ध कर सकता हूं। इस दुविधा का कोई उपाय मुझे बताइए।

तब बृहस्पति ने इंद्र की वेदना सुनकर उसे रक्षा विधान करने को कहा। श्रावण पूर्णिमा की सुबह बृहस्पति ने  मंत्रो का उच्चारण करके रक्षा सूत्र इंद्र को दिया।इसके बाद इंद्राणी ने श्रावणी पूर्णिमा के पावन अवसर पर इंद्र की दाहिनी कलाई में रक्षा सूत्र बांधकर युद्धभूमि में लड़ने के लिए भेज दिया। इंद्राणी द्वारा बांधे गए इस रक्षासूत्र के प्रभाव से दैत्य हार गए और इंद्र की विजय हुई। राखी बांधने की प्रथा यहीं से शुरू हुई।

रक्षाबंधन का पवित्र त्योहार समाज में प्रेम और भाईचारा बढ़ाने का एक अनूठा पर्व है। इतिहास के पन्नों पर भी राखी का विशेष महत्व बताया गया कि कैसे भाई ने अपनी बहन की राखी का मान रखा है और बहन ने अपने भाई के प्रति आदर और स्नेह का भाव बढ़ाया है राखी से जुड़ी भाई-बहन के प्रेम की कई कहानियां हैं जिनमें से ये ज्यादा विश्व विख्यात हुई..

श्री कृष्ण और द्रौपदी की राखी

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कथाओं के अनुसार एक बार भगवान श्रीकृष्ण के हाथ में चोट लग जाती है और उस घाव में से बहुत खून बहने लगता है जिसे द्रौपदी देखकर घबरा जाती है और तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर श्रीकृष्ण के हाथ में बांध देती है। जैसे एक बहन अपने भाई के कलाई में राखी बांध देती है।

इसके बाद द्रौपदी द्वारा साड़ी फाड़ कर बांधने से श्री कृष्ण का खून रुक जाता है। फिर जब दुःशासन द्रौपदी का चीरहरण कर रहा होता है तब द्रौपदी अपने भाई कृष्ण से मदद की गुहार लगाती है तब श्रीकृष्ण चीर बढ़ाकर उनकी इज्जत बचाते हैं।

 जहाँगीर और पन्ना की राखी

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राजस्थान की दो रियासतों में भयंकर झगड़ा चल रहा था। जिसमें से एक रियासत पर मुगलों ने आक्रमण कर दिया। ऐसा मौका पाकर दूसरी रियासत वाले राजपूत मुगलों का साथ देने के लिए तैयार थे। पन्ना भी इन्हीं मुगलों के घेरे में थी। ऐसे में पन्ना ने दूसरी रियासत के शासक जहाँगीर जो मुगलों की सहायता करने के लिए जा रहा था उसे  राखी भेज दी।

जहाँगीर राखी पाते ही बेहद खुश हुआ और पन्ना को अपनी बहन मानते हुए उसकी सहायता की और मुगलों पर ही उलटा आक्रमण कर दिया और विपक्ष के मुगल पराजित हुए। इस तरह पन्ना ने जहाँगीर  को राखी भेजकर दोनों रियासतों के शासकों को पक्की मैत्री के सूत्र में बाँध दिया।

कर्मवती और हुमायूं की राखी

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चित्तौड़ की हिन्दूरानी कर्मवती ने दिल्ली के मुगल बादशाह हुमायूं को अपना भाई मानकर उनके पास राखी भेजी थी। हुमायूं ने रानी कर्मवती की राखी स्वीकार की और समय आने पर रानी के सम्मान की रक्षा के लिए गुजरात के बादशाह से युद्ध किया।

उपसंहार – भाई बहन के प्रेम  प्रतीक के नाम से पहचाने जाने वाले इस त्योहार पर भारत  वासियों को बहुत गर्व है, लेकिन भारत में जहाँ पर बहनों के लिए इस विशेष त्योहार को मनाया जाता है वहीं पर कुछ भाइयों के कलाइयां सूनी ही रह जाती है। क्योंकि कुछ लोगों की रूढ़ीवादी सोच के चलते कन्या को जन्म से पहले ही गर्भ में ही मार दिया जाता है ।कुछ ऐसे स्थान है जहां आज भी कन्या का जन्म लेना एक अभिशाप माना जाता है। यह बहुत ही शर्मसार कर देने वाली बात है की जिस देश में एक तरफ नारी चाँद पर हो आई वही दूसरी तरफ उन्हें इस धरती पर जन्म ही नहीं लेने दिया जाता । अगर जल्द ही इस सोच को न बदला गया तो तय है इस संसार का विनाश होना क्योंकि जब नारी ही नहीं  होगी तो कैसे ये संसार चलेगा।

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