माँ संतोषी की कथा तथा पूजा विधि

माँ संतोषी की  कथा तथा पूजा विधि (  )

संतोषी माता को हिंदू धर्म में संतोष, शांति और वैभव की माता के रुप में पूजा जाता है संतोष हमारे जीवन में बहुत जरूरी है संतोष ना हो तो इंसान मानसिक और शारीरिक रूप से  बहुत  कमजोर हो जाता है  मान्यताओं के अनुसार माता संतोषी भगवान श्रीगणेश की पुत्री हैं माता संतोषी का व्रत पूजन करने से धन, विवाह संतान आदि  भौतिक सुखों में वृद्धि होती है यह व्रत शुक्ल पक्ष के पहले  शुक्रवार से शुरू किया जाता है

संतोषी माता की  पूजन विधि

सुख और सौभाग्य की कामना से माता संतोषी के 16 शुक्रवार का  व्रत किया जाता है सूर्योदय से पहले उठकर घर की सफ़ाई करे स्नान  के बाद  घर में किसी पवित्र स्थान  पर माता संतोषी की मूर्ति या फोटो को  स्थापित करे  एक कलश जल भर कर रखें कलश के ऊपर  एक कटोरा भर कर गुड़ व चना रखें माँ की पूजा में गुड और चना विशेष महत्व रखता है| अब  एक घी का दीपक जलाएं अक्षत, फ़ूल, नारियल, लाल चुनरी माँ को चढ़ाए

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माँ  संतोषी को गुड़ व चने का भोग लगाएँ अब संतोषी माता की जय बोलकर माता की कथा आरम्भ करें अब इस व्रत को करने वाला कथा सुनाएगा और यदि कोई सुनने वाले हो तो वे  हाथ में गुड़ और चने लेकर  कथा सुने  कथा समाप्त होने पर हाथ का गुड और चना गाय को खिला दे कलश के ऊपर रखा गुड और चना सभी को प्रसाद के रूप में बांट दे कथा समाप्त होने और आरती होने के बाद कलश के जल को घर में सब जगहों पर छिड़कें व्रत करने वाले को श्रद्धा और प्रेम से प्रसन्न मन से व्रत करना चाहिए.

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संतोषी माता की कथा

एक बुढिया थी जिसके 7  बेटे थे उनमे से 6  कमाते थे और एक कमाने वाला नही था  वह बुढिया उन 6  को अच्छा खाना  बनाकर बड़े प्यार  से खिलाती पर सातवें को बचा-खुचा खिलाती थी पर वह भोला था  मन में कुछ भी नही सोचता   था एक दिन वह अपनी पत्नी से बोला  देखो मेरी माँ  को मुझसे कितना प्यार  है? पत्नी ने  कहा वह तुम्हें सभी की झूठा  खिलाती है, फिर भी तुम ऐसा कहते हो

एक दिन बहुत बड़ा त्यौहार आया बुढिया ने सात तरह  के भोजन और  लड्डू बनाए सातवाँ लड़का अपनी पत्नी की बात को जाचने  के लिए सिर दुखने का बहाना करके पतला कपडा ओढ़कर सो गया और देखने लगा माँ ने उन 6 को  बहुत अच्छे आसनों पर बिठाया और सात प्रकार के भोजन और लड्डू परोसे वह उन्हें बड़े प्यार  से खिला रही है जब वो 6 भाई  उठ गए तो माँ ने उनकी थालियों से झूठन इकट्ठी की और उनसे एक लड्डू बनाया. फिर वह सातवें लड़के से बोली आजा खाना खा ले  वह बोला ‘ माँ मैं खाना  नहीं खाऊंगा  मैं तो परदेश जा रहा हूँ.’ माँ ने कहा ‘कल जाता है तो आज ही चला जा’ वह घर से निकल गया चलते समय उसे अपनी पत्नी की याद आयी  वह उसे देखने गया तो वो गोशाला में कंडे थाप रही थी वह बोला में जा रहा हु कुछ समय के लिए प्रदेश तुम अपना धर्म निभा कर बेठी रहना

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उसकी पत्नी बोली- जाओ आराम से मेरी चिंता मत करना राम भरोसे में रहूगी तुम्हारी मदद इश्वर करेगे कुछ निशानी देदो जिसे देख कर में धीरज धरु जब तक तुम नही आते

फिर वह बोला – ‘मेरे पास कुछ नहीं है. यह अंगूठी है सो ले और मुझे भी अपनी कोई निशानी दे दे. वह बोली मेरे पास क्या है? यह गोबर भरे हाथ है. यह कहकर उसने उसकी पीठ पर गोबर भरे हाथ की थाप मार दी वह लड़का चल दिया

चलते समय वह दूर देश में पहुँचा वह एक व्यापारी की दुकान पर जाकर बोला ‘ भाई मुझे नौकरी पर रख लो.’ व्यापारी को नौकर की जरुरत थी.व्यापारी  बोला रख तो लूँगा पर  काम देखकर दूंगा पैसा  वह सुभ 7  बजे से रात के 12  बजे तक नौकरी करने लगा कुछ ही  दिनों में सारा लेन देन और हिसाब – किताब करने लगा  सेठ ने  उसे दो तीन महीने में  आधे मुनाफे का हिस्सेदार बना दिया बारह वर्ष में वह नामी सेठ बन गया और उसका मालिक उसके भरोसे काम छोड़कर कहीं बाहर चला गया

वहा उसकी पत्नी  को सास और जिठानियाँ बड़ा कष्ट दे रही थी  वे उसे लकडी लेने जंगल में भेजती. भूसे की रोटी देती, वह बड़े कष्ट से जीवन बिताती थी एक दिन जब वह लकडी लेने जा रही थी तो रास्ते में उसने कई औरतों को व्रत करते देखा वह पूछने लगी – ‘बहनों यह किसका व्रत है

 

, कैसे करते है और इससे क्या फल मिलता है ? तो एक स्त्री बोली ‘ यह संतोषी माता का व्रत है इसके करने से मनोवांछित फल मिलता है, इससे गरीबी, मन की चिंताएँ, राज के मुकद्दमे. कलह, रोग नष्ट होते है और संतान, सुख, धन, प्रसन्नता, शांति, मन पसंद वर मिलता है  उसने उसे व्रत करने की विधि बता दी

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उसने रास्ते में सारी लकडियाँ बेच दी व गुड और चना ले लिया. उसने व्रत करने की तैयारी की. उसने सामने एक मंदिर देखा तो  वहा किसी से पूछने लगी ‘ यह मंदिर किसका है ?’ वह कहने लगे ‘ यह संतोषी माता का मंदिर है.’ वह मंदिर में गई और माता के चरणों में लोटने लगी वह दुखी होकर विनती करने लगी ‘माँ !  मैं बहुत दुखी हूँ मेरा दुःख दूर करो.’ माता को दया आ गयी माँ की शक्ति से  एक शुक्रवार को उसके पति का पत्र आया और अगले शुक्रवार को पति का भेजा हुआ धन मिला अब तो जेठ जेठानी और सास नाक सिकोड़ के कहने लगे ‘ अब तो इसकी खातिर बढेगी, यह बुलाने पर भी नहीं बोलेगी.’

वह बोली ‘ पत्र और धन आया  तो सभी को अच्छा हैं.’ उसकी आँखों में आंसू आ गये वह मंदिर में गई और माता के चरणों में गिरकर बोली हे माँ ! मैंने तुमसे पैसा कब माँगा था ? मुझे तो अपना सुहाग चाहिये. मैं तो अपने स्वामी के दर्शन और सेवा करना मांगती हूँ. तब माता ने प्रसन्न होकर कहा – ‘जा बेटी तेरा पति आएगा  वह बड़ी प्रसन्नता से घर गई और घर का काम काज करने लगी. उधर संतोषी माता ने उसके पति को स्वप्न में घर जाने और पत्नी की याद दिलाई उसने कहा माँ मैं कैसे जाऊँ, परदेश की बात है, लेन – देन का कोई हिसाब नहीं है.’ माँ ने कहा मेरी बात मान सवेरे नहा – धोकर मेरा नाम लेकर घी का दीपक जलाकर  दुकान पर बैठना देखते देखते सारा लेन – देन साफ़ हो जायेगा धन का ढेर लग जायेगा.

सवेरे उसने अपने स्वप्न की बात सभी से कही तो सब मजाक  उडाने लगे पर एक बूढे ने कहा ‘ भाई ! जैसे माता ने कहा है वैसे करने में कोई दिक्कत  है ?’ उसने नहा धोकर, माता को  घी का दीपक जलाया और दुकान पर जाकर बैठ गया  थोडी ही देर में सारा लेन देन साफ़ हो गया, सारा माल बिक गया और धन का ढेर लग गया वह प्रसन्न हुआ और घर के लिए गहने और सामान वगेरह खरीदने लगा| वह जल्दी ही घर को रवाना हो गया

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उधर बेचारी उसकी पत्नी रोज़ लकडियाँ लेने जाती और रोज़ संतोषी माता की सेवा करती उसने माता से पूछा – हे माँ ! यह धूल कैसी उड़ रही है ? माता ने कहा तेरा पति आ रहा है. तूं लकडियों के तीन गठरिया  बना लें एक नदी के किनारे रख, एक यहाँ रख और तीसरा अपने सिर पर रख ले तेरे पति के दिल में उस लकडी के गट्ठे को देखकर मोह पैदा होगा जब वह यहाँ रुक कर नाश्ता पानी करके घर जायेगा, तब तूँ लकडियाँ उठाकर घर जाना और चोक के बीच में गट्ठर डालकर जोर जोर से तीन आवाजें लगाना, ” सासूजी ! लकडियों का गट्ठा लो, भूसे की रोटी दो और कहना  आज मेहमान कौन आया है ?” उसने  माँ  संतोषी के चरण छूए और उनके  कहे अनुसार सारा काम किया.

यह सुनकर सास बाहर आकर कपट भरे वचनों से उसके दिए हुए कष्टों को भुलाने ले लिए कहने लगी ‘ बेटी ! तेरा पति आया है. आ, मीठा भात और भोजन कर और गहने कपडे पहन.’ अपनी माँ के ऐसे वचन सुनकर उसका पति बाहर आया और अपनी पत्नी के हाथ में अंगूठी देख कर व्याकुल हो उठा. उसने पूछा ‘ यह कौन है ?’ माँ ने कहा ‘ यह तेरी बहू है आज बारह बरस हो गए, यह दिन भर घूमती फिरती है, काम – काज करती नहीं है, तुझे देखकर नखरे करती है. वह बोला ठीक है. मैंने तुझे और इसे देख लिया है, अब मुझे दुसरे घर की चाबी दे दो, मैं उसमे रहूँगा.

माँ ने कहा ‘ ठीक है, जैसी तेरी मरजी’ और उसने चाबियों का गुच्छा पटक दिया. उसने अपना सामान तीसरी मंजिल के ऊपर के कमरे में रख दिया एक ही दिन में वे राजा के समान ठाठ – बाठ वाले बन गये इतने में अगला शुक्रवार आया बहू ने अपनी पति से कहा – मुझे संतोषी माता के व्रत का उद्यापन करना है वह बोला बहुत अच्छा ख़ुशी से कर ले  वह जल्दी ही उद्यापन की तैयारी करने लगी उसने जेठ के लड़कों को खाने  के लिए कहा उन्होंने मान लिया पीछे से जिठानियों ने अपने बच्चों को सिखादिया ‘ तुम खटाई मांगना जिससे उसका उद्यापन पूरा न हो.’ लड़कों ने खाने के बाद  खटाई मांगी बहू कहने लगी ‘ भाई खटाई किसी को नहीं दी जायेगी

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यह तो संतोषी माता का प्रसाद है.’ लडके खड़े हो गये और बोले तो फिर  पैसा लाओ  वह भोली कुछ न समझ सकी  अपनी जेठानियो की चाल  उसने पैसे दे दिये और वे इमली  मंगाकर खाने लगे इस पर संतोषी माता घुस्सा हो गई जिससे  राजा के दूत उसके पति को पकड़ कर ले गये वह बेचारी बड़ी दुखी हुई और रोती हुई माताजी के मंदिर में गई और उनके चरणों में गिरकर कहने लगी ‘ हे ! माता यह क्या किया ? हँसाकर अब तूँ मुझे क्यों रुलाने लगी ?’ माता बोली पुत्री मुझे दुःख है कि तुमने अभिमान करके मेरा व्रत तोडा है और इतनी जल्दी सब बातें भुला दी वह कहने लगी – ‘ माता ! मेरा कोई अपराध नहीं है उन  लड़को ने छल से  मेरा व्रत तोडा है  मैंने भूल से ही उन्हें पैसे दे दिये माँ मुझे क्षमा करो मैं दुबारा तुम्हारा उद्यापन करुँगी’ माता बोली ‘ जा तेरा पति रास्ते में आता हुआ ही मिलेगा.’ उसे रास्ते में उसका पति मिला उसके पूछने पर वह बोला ‘ राजा ने मुझे बुलाया था ‘ मैं उससे मिलने गया था वे फिर घर चले गये

कुछ ही दिन बाद फिर शुक्रवार आया वह दुबारा पति की आज्ञा से उद्यापन करने लगी उसने फिर जेठ के लड़को को बुलावा दिया जेठानियों ने फिर वहीं बात सिखा दी लड़के भोजन की बात पर फिर खटाई माँगने लगे उसने कहा ‘ खटाई कुछ भी नहीं मिलेगी आना हो तो आओ’ यह कहकर वह ब्राह्मणों के लड़को को लाकर भोजन कराने लगी यथाशक्ति उसने उन्हें दक्षिणा दी संतोषी माता उस पर बड़ी प्रसन्न हुई, माता की कृपा से नवमे मास में उसके एक सुन्दर पुत्र हुआ अपने पुत्र को लेकर वह रोजाना मंदिर जाने लगी

एक दिन संतोषी माता ने सोचा कि यह रोज़ यहाँ आती है आज मैं इसके घर चलूँ. इसका सासरा देखूं यह सोचकर माँ ने  एक भयानक रूप बनाया गुड व् चने से सना मुख, ऊपर को सूँड के समान होठ जिन पर मक्खियां भिनभिना रही थी इसी सूरत में वह उसके घर गई देहली में पाँव रखते ही उसकी सास बोली ‘ देखो कोई डाकिन आ रही है, इसे भगाओ नहीं तो किसी को खा जायेगी.’ लड़के भागकर खिड़की बन्द करने लगे सातवे लड़के की बहु खिड़की से देख रही थी वह वही से चिल्लाने लगी ” आज मेरी माता मेरे ही घर आई है  यह कहकर उसने बच्चे को दूध पीने से हटाया इतने में सास बोली ‘ पगली किसे देख कर उतावली हुई है, बच्चे को पटक दिया है.’इतने में संतोषी माता के प्रताप से वहाँ लड़के ही लड़के नज़र आने लगे. बहू बोली ” सासूजी मैं जिसका व्रत करती हूँ, यह वो ही संतोषी माता हैं. यह कह कर उसने सारी खिड़कियां खोल दी. सबने संतोषी माता के चरण पकड़ लिए और विनती कर कहने लगे – “हे माता ! हम मूर्ख हैं, अज्ञानी है,  तुम्हारे व्रत की विधि हम नहीं जानते थे  तुम्हारा व्रत भंग कर हमने बहुत बड़ा अपराध किया है हे माँ संतोषी आप हमारा अपराध क्षमा करो.” इस पर माता उन पर प्रसन्न हुई

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और सभी को सुभ फल देके चली गई|

 अब यह भी विशेष रूप से ध्यान  रखे-  इस दिन  व्रत करने वाले स्त्री-पुरुष को ना ही खट्टी चीजें हाथ लगानी चाहिए और ना ही खानी चाहिए

 

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