हिन्दू धर्म में महान मानी जाती हैं ये सतियाँ

हिन्दू धर्म में महान मानी जाती हैं ये सतियाँ (  )

हमारें सनातन धर्म में सतियों को एक अलग ही महत्व दिया गया हैं ये वो स्त्रियाँ हैं जिन्होंने अपने जीवनकाल में अनगिनत परीक्षाओं और अत्यंत कठिन परिस्थितयों का सामना करते हुए भी अपने पतिव्रता धर्म को नहीं त्यागा। भले ही समाज में इनके पतिव्रत पर अनेक सवाल भी उठाए गए। लेकिन इनकी सहनशीलता और त्याग के सामने यमराज तक को झुकना पड़ा,  तो कही त्रिदेव को बालक रूप धरना पड़ा।

इसी कारण आज भी हमारे समाज में ऐसी महान नारियों की मिसालें दी जाती हैं और वो हमारे इतिहास का अमिट हिस्सा हैं।उनमे से कुछ सतियों के विषय में हम आपको बताने जा रहे हैं। इनके बारे में ये भी कहा जाता हैं कि प्रातःकाल इनके स्मरण मात्र से ही सारे पाप धुल जाते हैं। अगर आप भी इनके बारे में जानना चाहते हैं तो नीचे पोस्ट में पढ़े ……

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अनुसूया

अत्री ऋषि की पत्नी अनुसूया को पतिव्रता गुण के कारण सतियों में सबसे ऊँचा स्थान दिया गया हैं। इनके बारे में कहा जाता हैं कि एक बार माँ सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती में बहस छिड़ गयी कि आखिर सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता कौन हैं? तब त्रिदेव ने कहाँ की अनुसूया सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता हैं। तीनों माता ने कहा ये बात सिद्ध कैसे होगी तब त्रिदेव ब्राहमण के भेष में उनके द्वार पर पहुँचे और भिक्षा मांगते हुए कहा कि हम भिक्षा तभी स्वीकार करेंगे जब आप निर्वस्त्र होकर हमें भिक्षा देंगी। ऋषि की पत्नी होने के कारण माता अनुसूया उन्हें वापस नहीं भेज सकती थी इसलिए अपने सतीत्व के बल से माता ने त्रिदेव को अबोध बालक बना दिया और उन्हें निर्वस्त्र होकर भिक्षा दे दी। माता अनुसूया ने ही माता सीता को पतिव्रता का उपदेश दिया था।

 

मंदोदरी

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मंदोदरी रावण की पत्नी और हेमा नामक अप्सरा की पुत्री थी।मंदोदरी के बारे में कहा जाता हैं कि ये पहले से ही जानती थी कि रावण का वध राम के हाथों से ही होना निश्चित हैं। इसलिए उन्होंने रावण से कहा कि वो सीता को वापस लौटा दे किन्तु रावण ने मंदोदरी की एक न सुनी और अंत में श्री राम के हाथों मारा गया।किवदंतियों के अनुसार, रावण के मरने के बाद राम की सलाह पर मंदोदरी ने विभीषण से विवाह कर लिया था लेकिन कुछ ग्रंथों के अनुसार रावण के पार्थिव शरीर के साथ मंदोदरी भी सती हो गयी थी।

सुलोचना

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युद्ध के दौरान जब मेघनाथ की मृत्यु ही गयी तो उसका शव रावण के पास भेज दिया गया लेकिन वो बिना सिर के था क्योंकि सिर रामचंद्र के पास ही छोड़ दिया गया। जब सुलोचना को ये पता चला की मेघनाथ का पार्थिव शरीर बिना सिर के आया हैं तो वो अपने पति का सिर लेने वहां पहुँच गयी और रामचंद्र से निवदेन करने लगी कि उसे उसके पति का सिर लौटा दिया जाए क्योंकि मैं भी अपने पति के साथ सती होना चाहती हूँ। यह सुन श्रीराम ने मेघनाथ का सिर सुलोचना को लौटा दिया जिसके बाद सुलोचना अपने पति के साथ ही अग्नि में बैठ गयी।

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सावित्री

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ऋषि अश्वपति की पुत्री और सत्यवान की पत्नी का नाम सावित्री था। इनके बारे में कहा जाता हैं की जब सत्यवान की असमय मृत्यु हो गयी तो अपने पतिव्रता के बल पर ये यमराज से भी अपने पति के प्राण वापस ले आयी थी। इन्हीं के नाम से वट सावित्री नामक व्रत का प्रचलन हुआ।

द्रौपदी

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पांच पांडवों की पत्नी और राजा द्रुपद की पुत्री द्रोपदी अर्थात पांचाली को पांच कुवारी कन्याओं में भी शामिल किया गया हैं। द्रोपदी के विवाह के लिए आयोजित स्वयंवर में अर्जुन ने इन्हें वरण किया तब अर्जुन वनवास काट रहे थे। द्रोपदी से विवाह करने के बाद अपने भाइयों के साथ अर्जुन अपनी कुटिया में पहुँच गए और माता कुन्ती को आवाज़ लगाकर कहा माता आज हम आपके लिए अद्भुत भिक्षा लेकर आए है। माता कुंती किसी कार्य में व्यस्त थी जिस कारण उन्होंने बिना देखें ही कह दिया कि तुम पांचो भाई आपस में बाँट लो। माता की आज्ञा का पालन करने की वजह से द्रोपदी ने पांचों को अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया लेकिन जब माता कुंती ने देखा कि वह कोई सामान नही बल्कि वधु लेकर आए थे तो उन्हें अपने कहे शब्दों का बहुत दुःख हुआ।
पांच व्यक्तियों की पत्नी होकर भी इन्होने पतिव्रत धर्म का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। कौरवों ने इनका चीरहरण करने का प्रयास किया और ये इनके पतिव्रत धर्म का ही प्रभाव था, जब पांडवों ने अपने शरीर को त्यागने का निर्णय लिया तो उनकी अंतिम यात्रा में ये भी उनके साथ थी।

तारा

तारा समुद्र मंथन के समय निकली थी। ये वानरराज बालि की पत्नी और अंगद की माता  थी। तारा अपनी बुद्धिमता के लिए प्रसिद्ध थी। पहली बार बालि से हारने के बाद जब सुग्रीव दोबारा लड़ने के लिए आया तो तारा ने बालि से कहा कि इसमें अवश्य हीं कोई षड़यंत्र है आप युद्ध ना करें लेकिन क्रोध में बालि ने इनकी बात नहीं सुनी और मारे गए। फिर श्रीराम की आज्ञा से बालि के छोटे भाई सुग्रीव से इनका विवाह सम्भव हुआ।

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कुन्ती

इनका असली नाम पृथा था लेकिन महाराज कुन्तिभोज ने इन्हें पाला जिसके कारण इनका नाम कुंती पड़ा। इनका विवाह भीष्म के भतीजे और धृतराष्ट्र के छोटे भाई पांडू से हुआ। विवाह से पूर्व भूलवश इन्होने महर्षि दुर्वासा के वरदान का प्रयोग सूर्यदेव पर किया जिसके परिणामस्वरुप कर्ण का जन्म हुआ लेकिन लोकलाज के डर से इन्होंने कर्ण को नदी में बहा दिया।

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अहिल्या

महर्षि गौतम की पत्नी अहिल्या कि सुन्दरता पर  देवराज इन्द्र रीझ गए और उन्होंने अहिल्या को प्राप्त करने की जिद ठान ली पर मन ही मन वे अहिल्या के पतिव्रत से डरते भी थे। एक बार रात्रि में हीं उन्होंने गौतम ऋषि के आश्रम पर मुर्गे के स्वर में बांग देना शुरू कर दिया जिसकी वजह से गौतम ऋषि ने समझा कि सवेरा हो गया है और इसी भ्रम में वे स्नान करने निकल पड़े। अहिल्या को अकेला पाकर इन्द्र ने गौतम ऋषि के रूप में आकर अहिल्या से प्रणय याचना की और उनका शील भंग किया। गौतम ऋषि जब वापस आए तो अहिल्या का मुख देख वो सब समझ गएकि इंद्र ने अहिल्या का शील भंग कर दिया हैं तब उन्होंने क्रोधवश इन्द्र को नपुंसक होने और अहिल्या को शिला में परिवर्तित  होने का श्राप दे दिया।

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