सीख – पर्वत कहता शीश उठाकर कविता अर्थ सहित

सिख कविता  पर्वत कहता शीश उठाकर, तुम भी ऊँचे बन जाओ। सागर कहता है लहराकर, मन में गहराई लाओ। समझ रहे हो क्या कहती हैं उठ-उठ गिर-गिर तरल तरंग भर लो भर लो अपने दिल में मीठी-मीठी मृदुल

पर्वत हिमालय हमारा

पर्वत हिमालय हमारा "कितनी सदिया बीत चुकी है। एक जगह खड़ा हिमालय रखवाली का वचन निभाए, कर्तव्यों की कथा सुनाए । अविचल और अडिग रहकर नित, मुश्कानो के कोष लुटाए। भारत माता के मस्तक पर