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Pandit Madan Mohan Malviya Biography Hindi

पं. मदनमोहन मालवीय जीवन परिचय (25 December 1861 – 12 November 1946)

About Mahamana Pandit Madan Mohan Malaviya Hindi Biography

‘महामना’ का अर्थ होता है बहुत ही उच्च और उदार मन वाला। भारत में केवल एक ही व्यक्ति को ‘महामना’ कहा गया और वह व्यक्ति थे- मदनमोहन मालवीय (Madan Mohan Malaviya)। मदन मोहन मालवीय, रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा दी गई इस उपाधि के सर्वथा योग्यभी थे। वे भारत के तत्कालीन प्रमुख लेखकों और पत्रकारों में से एक थे। वे प्रसिद्ध वकील थे। वे महान शिक्षाविद् थे। वे समाज सुधारक थे और सबसे बढ़कर हिंदी भाषा तथा भारत माता के सच्चे सेवक थे। वे सत्यवादी, देशभक्त और आत्मत्यागी थे।

संक्षिप्त विवरण
पूरा नाम
महामना पंडित मदन मोहन मालवीय
जन्म
Wednesday 25 December, 1861 , इलाहाबाद
मृत्यु
Tuesday 12 November, 1946 , इलाहाबाद
राष्ट्रीयता
शैक्षणिक योग्यता
एफ.ए., बी.ए., वक़ालत
प्रसिद्धि
समाज सुधारक
अन्य नाम
महामना, मालवीय जी
पुरस्कार
भारत रत्न
परिवार
पिता का नाम
पं० ब्रजनाथ
माता का नाम
मूनादेवी
पत्नी
कुमारी कुंदन देवी
संतान
रमाकांत, मलाती, राधाकांत, मुकुंद, रमा, गोविन्द मालवीय
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पूर्ण परिचय

मृदुभाषी मालवीय दूसरों को जो सलाह देते थे, उसका स्वयंपालन भी करते थे। उनमें इतने गुण थे कि उन्हें बड़ी आसानी से ‘आदर्श पुरुष’ की श्रेणी में रखा जा सकता है। महात्मा गांधी ने उन्हें ‘प्रातः स्मरणीय’ और ‘देवतापुरुष’ कहा था। गांधी जी ने उन्हें अपना बड़ा भाई और ‘भारत निर्माता’ भी कहा था। जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें एक ऐसी महान आत्मा कहा जिन्होंने आधुनिक भारतीयराष्ट्रीयता की नींव रखी। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने उन्हें ‘कर्मयोगी’ कहा। उन्हें ‘धर्मात्मा’ और ‘भिखारियों के राजकुमार’ जैसे संबोधन भी मिले। 2014 में उन्हें देश का सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ दिया गया।

प्रारम्भिक जीवन एवं शिक्षा

मालवा के थे पूर्वज इसलिए मालवीय कहलाए

मदनमोहन मालवीय के पूर्वज मध्य भारत के मालवा क्षेत्र के निवासी और संस्कृत के विद्वान थे। कालांतर में वे तीर्थराज प्रयाग (पहले इलाहाबाद, अब प्रयागराज) में आकर बस गए और मालवीय कहलाए। हालांकि उनका कुलनाम चतुर्वेदी था। प्रयाग में ही लाल डिग्गी मोहल्ले में पंडित ब्रजनाथ और श्रीमती मोना देवी के घर 25 दिसंबर 1861 को मदन मोहन का जन्म हुआ। वे अपने माता-पिता के पांच पुत्र और दो पुत्रियों में सबसे गुणी, निपुण और मेधावी थे।

मालवीय की प्रारंभिक शिक्षा प्रयाग की पंडित हरदेव धर्म ज्ञानोपदेश पाठशाला में पांच वर्ष की आयु से शुरू हुई। धर्म के प्रति मालवीय का रुझान शुरू से ही था। ऐसा होना स्वाभाविक भी था क्योंकि उनके पिता संस्कृत के विद्वान थे और भागवत कथा सुनाकर परिवार चलाते थे।

उल्लेखनीय कार्य 

15 वर्ष की आयु में ‘मकरंद’ के नाम से कविताएं लिखीं

प्रारंभिक शिक्षा के बाद मालवीय को विद्यावर्धिनी सभा द्वारा संचालित विद्यालय में भेजा गया।इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद के जिला स्कूल में दाखिला लिया, जो अंग्रेजी माध्यम कास्कूल था। इस समय उनकी आयु करीब 15 वर्ष थी और इसी आयु में उन्होंने ‘मकरंद’ उपनाम से कविताएं लिखनी शुरू कर दीं जो ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ जैसी प्रसिद्ध पत्रिका में छपीं। 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह मिर्जापुर के पंडित नंदलाल की पुत्री कुंदन देवी के साथ हो गया था।

1879 में मालवीय ने उस समय के म्योर सेंट्रल कॉलेज और आज के इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दसवीं पास की। मालवीय जी के घर की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी। ऐसे में हैरिसन कॉलेज के प्रिंसिपल ने उन्हें छात्रवृत्ति दिलाई, जिससे उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से 1884 में बी.ए. की उपाधि हासिल की।

मालवीय के पिता उन्हें कथावाचक बनाना चाहते थे। उधर, मालवीय संस्कृत में स्नातकोत्तर उपाधि पाना चाहते थे, लेकिन घर की कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण उन्हें जुलाई 1884 में इलाहाबाद के गवर्नमेंट हाईस्कूल में शिक्षक की नौकरी करनी पड़ी। उनका वेतन प्रति माह 40 रुपये था।

पत्रकारिता में झंडे गाड़े

इस समय तक मालवीय सामाजिक क्षेत्र में भी सक्रिय हो गए थे। उन्होंने प्रयाग हिंदू सभा की स्थापना की और समकालीन समस्याओं के बारे में विचार भी प्रस्तुत करने लगे। 1884 में वे हिंदी उद्धारिणी प्रतिनिधि सभा के सदस्य बन गए थे।

फिर आया भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन, जो 1886 में कलकत्ता में हुआ। इसमें मालवीय ने भी भाग लिया। यहां उन्होंने कौंसिलों में प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर अंग्रेजी में ऐसा भाषण दिया कि अधिवेशन के अध्यक्ष दादा भाई नौरोजी के साथ ही प्रतापगढ़ जिले में स्थित कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह बहुत ही प्रभावित हुए। मालवीय को भाषण का अभ्यास बचपन से ही था। सात वर्ष की अवस्था में धर्म ज्ञानोपदेश पाठशाला के देवकीनंदन मालवीय उन्हें माघ मेले में ले जाते थे और वहां मूढ़े पर खड़ा कर उनसे व्याख्यान दिलवाते थे।

कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह तो मालवीय से इतना प्रभावित हुए कि 1887 में हिंदी और अंग्रेजी के समाचार पत्र ‘हिंदुस्तान’ का संपादन उन्हें सौंप दिया। मालवीय ने शिक्षक की नौकरी छोड़ इस अखबार को साप्ताहिक से दैनिक किया और करीब ढाई वर्ष तक इसका संपादन किया। इसके बाद वे कानून की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद लौट आए।

कानून की पढ़ाई करते समय ही उन्होंने कांग्रेस के नेता पंडित अयोध्यानाथ के समाचार पत्र ‘इंडियन ओपनियन’ के संपादन में भी योगदान दिया। 1907 में उन्होंने ‘अभ्युदय’ नाम का साप्ताहिक निकाला और उसे संपादित भी किया। 1909 में वे ‘लीडर’ अखबार लेकर आए। 1909 से 1911 तक वे इसके संपादक रहे और 1911 से 1919 तक अध्यक्ष रहे। 1910 में उन्होंने हिंदी में ‘मर्यादा’ नाम की पत्रिका भी निकाली। ‘अभ्युदय’ और ‘लीडर’ अपने समय के चर्चित समाचार पत्र थे। दिल्ली में 1924 में मालवीय ने एमआर जयकर, लाला लाजपत राय और घनश्याम दास बिड़ला की मदद से ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ को बुरी हालत से उबारा।

1924 से 1946 तक वे ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के अध्यक्ष रहे। इसी दौरान 1936 में हिंदी का ‘हिंदुस्तान’ अखबार शुरू किया गया। इसके साथ ही उन्होंने लाहौर से ‘विश्वबंधु’ समाचार पत्र निकाला जो धर्म पर केद्रित था। इस प्रकार पत्रकारिता के जरिये मदनमोहन मालवीय ने जनता को जागरूक करने का काम बेहद सफलतापूर्वक किया।

सफल वकील

कानून की पढ़ाई पूरी कर मालवीय ने एल.एल.बी. की डिग्री ली और 1891 में इलाहाबाद के जिला न्यायालय में वकालत करने लगे। 1893 में वे वकील के रूप में इलाहाबाद हाईकोर्ट में आ गए। जल्द ही वह सफल वकील बन गए, लेकिन 1911 में उन्होंने समाजसेवा और देशसेवा के लिए वकालत छोड़ दी और स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। हालांकि 1924 में वह एक बार फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट लौटे। उस समय वह 177 स्वतंत्रता सेनानियों के वकील बने, जिन्हें सत्र न्यायालय ने फांसी की सजा सुनाई थी। यह मालवीय की विद्वता का ही कमाल था कि वे 156 आरोपियों को दोषमुक्त करवाने में सफल रहे।

शिक्षा के क्षेत्र में योगदान

1911 में मालवीय की मुलाकात एनी बेसेंट से हुई। मालवीय औरएनी बेसेंट ने वाराणसी में एक हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना का निर्णय लिया। मालवीय 1905 से ही इस विश्वविद्यालय को खोलने के बारे में सोच रहे थे। विश्वविद्यालय केलिए मालवीय ने एक करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा और 1915 तक 50 लाख रुपये काइंतजाम भी कर लिया था। इस दौरान उन्हें लोगों की झिड़कियां और दुत्कार भी सुननींपड़ीं। उन्होंने शवयात्राओं में फेंके जाने वाले पैसे भी उठाए। इस प्रकार 1916 मेंएशिया के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालय ‘बनारस हिंदू विश्वविद्यालय’ की स्थापनाहुई। मालवीय इस विश्वविद्यालय के कुलपति बने और 1939 तक इस पद पर रहे।

मालवीय ने प्रयाग में भारती भवन पुस्तकालय, मैकडोनेल यूनिवर्सिटी हिंदू छात्रावास और मिंटो पार्क भी बनवाया। इसी दौर में मालवीय इलाहाबाद में नगर पालिका के सदस्य भी रहे और 1916 तक इस क्षेत्र में कार्य किया।

मालवीय ने ही भारत में स्वयंसेवक संस्कृति (स्काउट कल्चर) की शुरुआत की। वे भारत में स्काटिंग के संस्थापकों में से एक थे। उन्होंने 1917 में इलाहाबाद में सेवा समिति स्काउट एसोसिएशन की शुरूआत की थी।

सामाजिक क्षेत्र की उपलब्धियां

मालवीय महिलाओं की शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह के समर्थक थे। उन्होंने बाल विवाह का भी विरोध किया। उन्होंने गंगा की अविरल धारा के लिए गंगा महासभा भी बनाई। उनके प्रयासों से 1916 में एक समझौता भी हुआ जिसे अविरल गंगा रक्षा समझौता कहा जाता है।

हरिजन आंदोलन के तहत छुआछूत को समाप्त करने में भी मालवीय ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1933 में गठित हरिजन सेवक संघ की पहली बैठक के अध्यक्ष मालवीय ही थे।

प्राणों में बसा था धर्म

मालवीय सनातन धर्म और हिंदू संस्कृति के बहुत बड़े पैरोकार थे। उन्होंने सामाजिक सुधार का लक्ष्य रखते हुए सनातन धर्म और हिंदू संस्कृति के लिए शक्तिशाली आंदोलन चलाया। उन्होंने इसमें जात-पात का भेदभाव नहीं किया और तीव्र विरोध के बावजूद कलकत्ता, काशी प्रयास और नासिक में दलितों को धर्मोपदेश और मंत्र दीक्षा प्रदान की। 1880 में छात्र जीवन में ही उन्होंने ‘हिंदू समाज’ नामक संगठन की स्थापना कर दी थी।

प्रयाग हिंदू सभा, भारत धर्म महामंडल और हिंदू महासभा के जरिये उन्होंने सनातन धर्म का का प्रचार किया। हिंदू महासभा को कट्टटर हिंदूवादी संगठन माना जाता था, लेकिन मालवीय इसके सबसे उदार सदस्य थे। तभी तो वे एक ही समय में हिंदू महासभा में भी थे और कांग्रेस में भी।

स्वयं जवाहर लाल नेहरू के अनुसार मालवीय के नेतृत्व काल में हिंदू महासभा राजनीतिक प्रतिक्रियावादिता से मुक्त रही और उसने धर्मों के सहअस्तित्व में अपनी आस्था व्यक्त की। ऋषिकुल हरिद्वार, गोरक्षा और आयुर्वेद सम्मेलन तथा सेवा समिति जैसी संस्थाएं भी मालवीय ने शुरू कीं। उनकी पहल पर हरिद्वार में हर की पैढ़ी घाट पर की शुरू की गई आरती अब भी की जाती है। उनके धार्मिक विचार हमें ‘हिंदू धर्मोपदेश’, ‘मंत्र दीक्षा’ औऱ ‘सनातन धर्म प्रदीप’ जैसे ग्रंथों में पढ़ने को मिलते हैं।

हिंदू महासभा का सदस्य होने के बावजूद मालवीय हिंदू-मुस्लिम एकता के समर्थक थे। कलकत्ता में 1913 के कांग्रेस के अधिवेशन में उन्होंने कहा, “भारतहिंदू, मुस्लिम, सिख, पारसी और बाकी सभी का है। कोई भी एक समुदाय बाकियों पर प्रभुत्व नहीं जमा सकता।…. हमें ऐसा संविधान और कानून बनाना होगा कि चाहे जैसी भी परिस्थिति हो, कोई भी किसी दूसरे से न डरे।”

धर्म मालवीय के लिए प्राणों से भी बढ़कर था। उनका कहना था, “सर जाय तो जाय, प्रभु मेरो धर्म न जाय।” उन्होंने यह भी कहा, “हम धर्म को चरित्र-निर्माण का सीधा मार्ग और सांसारिक सुख का सच्चा द्वार समझते हैं।”

हिंदी के सच्चे सेवक

महामना मदन मोहन मालवीय ने हिंदी की बहुत सेवा की। 1884 में वे हिंदी उद्धारिणी प्रतिनिधि सभा के सदस्य बन गए थे। उन्होंने देवनागरी लिपि और हिंदी भाषा को कचहरियो में स्थान दिलाया। इसके लिए उन्होंने 1898 में पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध के गवर्नर मैकडोनेल के सामने बाकायता अनेक प्रमाण भी प्रस्तुत किए।

1910 में हिंदी साहित्य सम्मेलन के पहले अधिवेशन के वे अध्यक्ष थे। इस दौरान उन्होंने कहा कि जिस प्रकार हिंदी को अरबी और फारसी के बड़े-बड़े शब्दों से लादना बुरा है उसी प्रकार उसे बिना किसी कारण के संस्कृत शब्दों से गूंथना भी अच्छा नहीं है। इसी अधिवेशन में उन्होंने भविष्य में हिंदी के राष्ट्रभाषा बनने की भविष्यवाणी भी की थी। वे प्रांतीय भाषाओं के विकास के भी हिमायती थे।

स्वतंत्रता संग्राम में योगदान

मदनमोहन मालवीय चार बार 1909 (लाहौर), 1918 (दिल्ली), 1932 (दिल्ली) और 1933 (कलकत्ता) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। वे कांग्रेस में गोपाल कृष्ण गोखले के नेतृत्व वाले नरम दल के नेता माने जाते थे। हालांकि उन्हें गरम और नरम दल के बीच की कड़ी भी माना जाता था। वे कांग्रेस में हिंदू-मुसलमानों के साथ ही उसके विभिन्न मतों में सामंजस्य बनाने के लिए जाने जाते थे। असहयोग आंदोलन के दौर में जब नरम दल के नेताओं ने कांग्रेस छोड़ी तो मालवीय उसमें बने रहे थे। एनी बेसेंट ने उनके बारे में कहा था कि विभिन्न मतों के बीच केवल मालवीय भारतीय एकता की मूर्ति बनकर खड़े दिखाई देते हैं।

  1. 1912 में मालवीय इंपीरियल विधान परिषद के सदस्यबने। 1919 में जब इस परिषद को केंद्रीय विधान परिषद में बदल दिया गया तो भी मालवीयइसमें मौजूद रहे और 1926 तक सदस्य बने रहे। उन्होंने 1916 के लखनऊ समझौते का विरोधकिया जिसमें मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचन की बात कही गई थी।
  2. मालवीय ने असहयोग आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिकानिभाई। हालांकि इसी दौरान चले खिलाफत आंदोलन में कांग्रेस की भागीदारी का विरोध भीकिया। 1921 में आंदोलन के दौरान जब जेलें कांग्रेस के नेताओं और स्वयंसेवकों से भरगईं तो ऐसे में मालवीय ने परेशान वायसराय लॉर्ड रीडिंग को प्रांतों में स्वशासनदेकर गांधी जी से संधि करने के लिए राजी कर लिया था। लेकिन फरवरी 1922 के चौरीचौराकांड ने सब गुड़गोबर कर दिया। गांधी जी ने आंदोलन वापस ले लिया। इस फैसले के पीछेमालवीय की सलाह होना बताया गया। गांधी जी पांच वर्ष के लिए जेल भेज दिए गए। इसदौरान मालवीय ने पेशाव से डिब्रूगढ़ तक दौरा किया और राष्ट्रीय चेतना की लौ कोबुझने नहीं दिया।
  3. 1928 में उन्होंने जवाहरलाल नेहरू, लाला लाजपतराय और अन्य नेताओं के साथ साइमन कमीशन का विरोध किया। 1931 में मालवीय ने ‘गोलमेजबैठक’ में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया।
  4. 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में मालवीय दो बारगिरफ्तार हुए। पहले उन्हें मुंबई में गिरफ्तार किया। 25 अप्रैल 1932 को कांग्रेसके 450 स्वयंसेवकों के साथ मालवीय को दिल्ली में गिरफ्तार कर लिया गया।
  5. 30 मई 1932 को मालवीय ने एक घोषणा पत्र जारीकरके ‘भारतीय खरीदो, स्वदेशी खरीदो’ आंदोलन पर ध्यान केंद्रित करने की सिफारिश की।
  6. 25 सितंबर 1932 को हुए ‘पूना पैक्ट’ समझौते परमालवीय और डॉ. भीमराव अंबेडकर ने हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत प्रांतीय विधानमंडलोंमें दलित वर्ग के लिए अलग निर्वाचन के बजाय सामान्य निर्वाचन में ही सीटें रिजर्वकरने की व्यवस्था की गई थी।
  7. 1934 में ‘कम्युनल अवार्ड’ से असहमति जताते हुएमालवीय कांग्रेस से अलग हो गए और ‘कांग्रेस नेशनलिस्ट पार्टी’ के नाम से अलग दलबना लिया। उस साल केंद्रीय विधानमंडल के लिए हुए चुनावों में उनकी पार्टी ने 12सीटें जीतीं।

निधन

1937 में मालवीय सक्रिय राजनीति से दूर हो गए। इससे पहले 1936 में में दिए एक भाषण मेंमालवीय ने कहा था- “मैं पचास वर्ष से कांग्रेस के साथ हूँ। संभव है मैं बहुत दिन न जीऊं और अपने जी में यह कसक लेकर मरूं कि भारत अब भीपराधीन है। किंतु फिर भी मैं यह आशा करता हूँ कि मैं इस भारत को स्वतंत्र देखसकूंगा।”
उनकी यह आशापूरी नहीं हुई और देश की आजादी से करीब नौ महीने पहले बीमारी की वजह से वाराणसी में 12नवंबर 1946 को उनका निधन हो गया।

अन्य गुण और विशेषताएं

  • वेशभूषा और आचार विचार में मालवीयको भारतीय संस्कृति का प्रतीक और ऋषियों का प्राणवान स्मारक माना जाता था।
  • व्यायाम और सितार पर शास्त्रीयसंगीत में भी मालवीय की बहुत रुचि थी। व्यायाम तो उन्होंने 60 वर्ष की आयु तकनियमित रूप से किया।
  • मालवीय की हिंदी, संस्कृत औरअंग्रेजी भाषाओं पर अद्भुत पकड़ थी। उनके भाषण लोगों को सोचने पर मजबूर करते थे।बड़ी कौंसिल में उन्होंने रोलेट एक्ट के विरोध में लगातार साढ़े चार घंटे तक भाषणदिया था। अपराध निर्मोचन बिल पर वे पांच घंटे तक बोले थे।
  • मालवीय को ‘मुंडकोपनिषद्’ की सूक्ति‘सत्यमेव जयते’ को प्रचलित करने का श्रेय जाता है। इसका अर्थ है- केवल सत्य कीविजय होती है। बाद में इस सूक्ति को देश का राष्ट्रीय सूक्त वाक्य स्वीकार कियागया और देश के सरकारी प्रतीक चिन्हों के नीचे लिखा गया।
  • देशसेवा के बारे में मालवीय कहते थे कि हम देशभक्ति कोसर्वोत्तम शक्ति मानते हैं जो मनुष्य को उच्च कोटि की निःस्वार्थ सेवा करने की ओर प्रवृत्त करती है।

सम्मान

  • मालवीय के सम्मान में दिल्ली, जयपुर, लखनऊ औरइलाहाबाद समेत अनेक शहरों में मालवीय नगर बनाए गए हैं। गोरखपुर में उनके नाम परमदन मोहन मालवीय यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी स्थापित की गई है। जयपुर में उनके नामपर मालवीय नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी स्थित है। अन्य अनेक संस्थानों को भीउनका नाम दिया गया है।
  • डाक विभाग ने उनके सम्मान में 1961 और 2011 मेंडाक टिकट जारी किए।
  • महामना का चित्र संसद के सेंट्रल हाल में लगायागया है। इसके अतिरिक्त बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर उनकी प्रतिमालगाई गई है।
  • 2008 में दिल्ली में दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर‘मालवीय स्मृति भवन’ के नाम से महामना का राष्ट्रीय स्मारक भी बनाया गया है।
  • 22 जनवरी 2016 से उनके नाम पर ‘महामनाएक्सप्रेस’ रेलगाड़ी भी चलाई गई।
  • 24 दिसंबर 2014 को मालवीय की 153वीं जयंती सेएक दिन पहले भारत सरकार ने उन्हें ‘भारत रत्न’ के सम्मान से अलंकृत किया।

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Lav Kumar Singh
करीब 20 वर्ष हिंदी दैनिक अमर उजाला और हिंदुस्तान में (उप संपादक से उप समाचार संपादक तक) काम किया है । इसके अलवा दिल्ली के प्रकाशक पुस्तक महल के लिए मैंने करीब 15 पुस्तकें जनरल सब्जेक्ट पर लिखी हैं। करीब इतनी ही पुस्तकों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद भी किया है। विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख, कहानी, कविता आदि भी लिखता रहा हूं। खास तौर से दिल्ली प्रेस की पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं ज्यादा प्रकाशित हुई हैं।

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