Saturday, 21 October, 2017
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साधना से व्यक्तित्व और चरित्र का निर्माण

साधना से व्यक्तित्व और चरित्र का निर्माण ( %e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a4%a8%e0%a4%be %e0%a4%b8%e0%a5%87 %e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b5 %e0%a4%94%e0%a4%b0 %e0%a4%9a%e0%a4%b0 )

साधना से व्यक्तित्व और चरित्र का निर्माण-
साधु वही है|जो ज्ञानी है,दृष्टि एवं गुण सम्पन्न है,संयमी और तपस्वी है|साधना ही इसका पर्याय है|साधना पथमें अग्रसर साधक में ज्ञान ,संयम ,तप,एवं दृष्टि के गुण होने आवश्यक है|तभी साधना के सोपान को छुआ जा सकता है|साधना जीवन निर्माण का सोपान है|साधना के द्वारा ही व्यक्ति जीवन का सर्वागीण विकास कर सकता है|बिना साधना के व्यक्ति का विकास अधुरा ही रह जाता है|
साधना में प्रतिष्ठा होने के लिए तप,त्याग,की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है|साधना निःस्वार्थ चेतना का प्रतिक है|साधना में उतरने से पहले व्यक्ति में समता का होना आवश्यक है|समता ही साधना का विकास द्वार है|जीवन में साधना के अनेक पक्ष है,जीवन में मन,वचन और काया का संयम करना ही सबसे बड़ी साधना है|साधना व्यक्ति की नई दिशा एवं दशा की और अग्रसर करती है|व्यक्ति निर्माण की महत्वपूर्ण एवं अध्यात्मिक प्रक्रिया है साधना|

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Shanu Shetri
Shanu Shetri - Editor at hindirasayan.com.

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