Thursday, 14 December, 2017
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मधुर मधु-सौरभ जगत्

मधुर मधु-सौरभ जगत् को मधुर मधु-सौरभ जगत् को स्वप्न में बेसुध बनाता वात विहगों के विपिन के गीत आता गुनगुनाता ! मैं पथिक हूँ श्रांत, कोई पथ प्रदर्शक भी न मेरा ! चाहता अब

मुझे फूल मत मारो

मुझे फूल मत मारो मुझे फूल मत मारो, मैं अबला बाला वियोगिनी, कुछ तो दया विचारो। होकर मधु के मीत मदन, पटु, तुम कटु गरल न गारो, मुझे विकलता, तुम्हें विफलता, ठहरो, श्रम परिहारो। नही