Tuesday, 24 October, 2017
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कौन

कौन इतने उचे नील गगन में , तारो को चमकाता कौन? साँझ सवेरे पूर्व दिशा में, सूरज चाँद उगाता कौन? ये पर्वत ये नदियाँ-सागर , किसने यहाँ बनाए है वृक्ष लताए –पौधे सुंदर किसने यहाँ उगाए है? कौन बहाता

मधुशाला

मधुशाला - किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हाला किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला, किसी ओर मैं देखूं, मुझको दिखलाई देता साकी किसी ओर देखूं, दिखलाई पड़ती मुझको मधुशाला -हरिवंश राय

रतनारी हो थारी आँखड़ियाँ

रतनारी हो थारी आँखड़ियाँ रतनारी हो थारी आँखड़ियाँ। प्रेम छकी रसबस अलसाड़ी, जाणे कमलकी पाँखड़ियाँ॥ सुंदर रूप लुभाई गति मति, हो गईं ज्यूँ मधु माँखड़ियाँ। रसिक बिहारी वारी प्यारी, कौन बसी निस काँखड़ियाँ॥ -बिहारी

मधुर मधु-सौरभ जगत्

मधुर मधु-सौरभ जगत् को मधुर मधु-सौरभ जगत् को स्वप्न में बेसुध बनाता वात विहगों के विपिन के गीत आता गुनगुनाता ! मैं पथिक हूँ श्रांत, कोई पथ प्रदर्शक भी न मेरा ! चाहता अब

मुझे फूल मत मारो

मुझे फूल मत मारो मुझे फूल मत मारो, मैं अबला बाला वियोगिनी, कुछ तो दया विचारो। होकर मधु के मीत मदन, पटु, तुम कटु गरल न गारो, मुझे विकलता, तुम्हें विफलता, ठहरो, श्रम परिहारो। नही

मधुशाला

मधुशाला उतर नशा जब उसका जाता, आती है संध्या बाला, बड़ी पुरानी, बड़ी नशीली नित्य ढला जाती हाला, जीवन के संताप शोक सब इसको पीकर मिट जाते सुरा-सुप्त होते मद-लोभी जागृत रहती मधुशाला।। -हरबंश राय

विनती

विनती तन से मन से और बुधि से हम बहुत बड़े हो,पर्वत से हो सिर उचा कर सीना तान खड़े हो, कोई काम हो भारी हम करके दिखला दे आँधी से हो,मुसीबत को बादल-सा बिखरा

पर्वत हिमालय हमारा

पर्वत हिमालय हमारा कितनी सदिया  बीत चुकी है| एक जगह खड़ा हिमालय रखवाली का वचन निभाए कर्तव्यो की कथा सुनाए  | अविचल और अडिग रहकर नित ,मुश्कानो के कोष लुटाए| भारत माता के मस्तक पर

हम भी सीखे

कुदरत हमको रोज सिखाती जग हित में कुछ करना सीखे अपने लिए सभी जीते है| औरो के हित  मरना सीखो सूरज हमे रोशनी देता तारे शीतलता बरसाते चाँद बाटता अमृत सबको बादल वर्षा –जल दे जाते जुगनू से