Monday, 23 October, 2017

समय

समय ( %e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%af )

समय
समय कैसे छलता है,वह सब जो अपना था,
अपना होना लगता था,जिसके साथ चलना शुरू हुआ था,
बिना अहसास कराए सहज ही छुट गया,
फिर धीरे-धीरे अनजान –अपरिचित,जो भी,जुड़ता गया,
उसे ही सच –माना वही सच लगा,
वह भी तो नही रहा साथ ,
सब बिछड़ता गया दरवाजे दर दरवाजे कहा ले आया समय की पीछे रह गई,
बस,जैसे शीशे की दीवारे की उनमें से दीखता तो सब है,
अतीत पर वापस किसी भी जगह किसी भी अपने से मिल नही सकता|
और अब जो साथ है,कैसे विकल्प बना साथ साथ चल रहा है|
जबकि कैसा भी वर्तमान अतीत का विकल्प नहीं बन सकता फिर भी जो वर्तमान है|सब अमृत सच लगता है झूट है सब सच समय कैसा छलता है|

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Shanu Shetri
Shanu Shetri - Editor at hindirasayan.com.

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