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Dr. Hariom Panwar Kavita Kargil Amar Shaheedo Ki Gatha

कारगिल शहीदों की अमर गाथा… : डॉ. हरिओम पंवार

मै केशव का पाञ्चजन्य हूँ गहन मौन मे खोया हूं, उन बेटो की याद कहानी लिखते-लिखते रोया हूं जिन माथे की कंकुम बिंदी वापस लौट नहीं पाई चुटकी, झुमके पायल ले गई कुर्वानी

पर्वत हिमालय हमारा

पर्वत हिमालय हमारा "कितनी सदिया बीत चुकी है। एक जगह खड़ा हिमालय रखवाली का वचन निभाए, कर्तव्यों की कथा सुनाए । अविचल और अडिग रहकर नित, मुश्कानो के कोष लुटाए। भारत माता के मस्तक पर

सीख

सिख पर्वत  कहता शीश उठाकर , तुम भी उचे बन जाओ सागर कहता है लहराकर मन में गहराई लाओ समझ रहे हो क्या कहती है उठ –उठ गिर-गिर तरल तरंग भर लो भर लो  अपने मन

हिन्दुस्तान कहाँ है ?

साक्षरता का है आन्दोलन ,चिन्तन का विस्तार कहाँ है जन जन में जो फैल रही उस शिक्षा में संस्कार कहा है बड़ी-बड़ी खोजे सकल विश्व में  अपना हिंदुस्तान कहाँ है आओ खोजे सकल

विनती

विनती तन से मन से और बुधि से हम बहुत बड़े हो,पर्वत से हो सिर उचा कर सीना तान खड़े हो, कोई काम हो भारी हम करके दिखला दे आँधी से हो,मुसीबत को बादल-सा बिखरा

कौन

कौन इतने उचे नील गगन में , तारो को चमकाता कौन? साँझ सवेरे पूर्व दिशा में, सूरज चाँद उगाता कौन? ये पर्वत ये नदियाँ-सागर , किसने यहाँ बनाए है वृक्ष लताए –पौधे सुंदर किसने यहाँ उगाए है? कौन बहाता

मधुशाला

मधुशाला - किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हाला किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला, किसी ओर मैं देखूं, मुझको दिखलाई देता साकी किसी ओर देखूं, दिखलाई पड़ती मुझको मधुशाला -हरिवंश राय

रतनारी हो थारी आँखड़ियाँ

रतनारी हो थारी आँखड़ियाँ रतनारी हो थारी आँखड़ियाँ। प्रेम छकी रसबस अलसाड़ी, जाणे कमलकी पाँखड़ियाँ॥ सुंदर रूप लुभाई गति मति, हो गईं ज्यूँ मधु माँखड़ियाँ। रसिक बिहारी वारी प्यारी, कौन बसी निस काँखड़ियाँ॥ -बिहारी

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