Tuesday, 25 April, 2017
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हिन्दुस्तान कहाँ है ?

साक्षरता का है आन्दोलन ,चिन्तन का विस्तार कहाँ है जन जन में जो फैल रही उस शिक्षा में संस्कार कहा है बड़ी-बड़ी खोजे सकल विश्व में  अपना हिंदुस्तान कहाँ है आओ खोजे सकल विश्व में अपना हिंदुस्तान कहाँ है महानगर  में गगन चुमते ऊँचे-ऊँचे भवन खड़े है बड़े-बड़े भवनों में झाँके तो टूटे परिवार पड़े

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सीख

सिख पर्वत  कहता शीश उठाकर , तुम भी उचे बन जाओ सागर कहता है लहराकर मन में गहराई लाओ समझ रहे हो क्या कहती है उठ –उठ गिर-गिर तरल तरंग भर लो भर लो  अपने मन में मीठी-मीठी मृदुल उमंग पृथ्वी कहती ,धेर्य न छोडो कितना ही हो ,सर पर भार नभ कहता है फैलो इतना ढक लो तुम सारा संसार

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कौन

कौन इतने उचे नील गगन में , तारो को चमकाता कौन? साँझ सवेरे पूर्व दिशा में, सूरज चाँद उगाता कौन? ये पर्वत ये नदियाँ-सागर , किसने यहाँ बनाए है वृक्ष लताए –पौधे सुंदर किसने यहाँ उगाए है? कौन बहाता पवन सदा बादल रिमझिम बरसात है? बारी-बारी से ऋतूओ को कौन जगत में लाता है? जिस प्रभु की यह लीला सारी उसको शीश झुकाए हम उसके

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मधुशाला

मधुशाला - किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हाला किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला, किसी ओर मैं देखूं, मुझको दिखलाई देता साकी किसी ओर देखूं, दिखलाई पड़ती मुझको मधुशाला -हरिवंश राय बच्चन

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रतनारी हो थारी आँखड़ियाँ

रतनारी हो थारी आँखड़ियाँ रतनारी हो थारी आँखड़ियाँ। प्रेम छकी रसबस अलसाड़ी, जाणे कमलकी पाँखड़ियाँ॥ सुंदर रूप लुभाई गति मति, हो गईं ज्यूँ मधु माँखड़ियाँ। रसिक बिहारी वारी प्यारी, कौन बसी निस काँखड़ियाँ॥ -बिहारी

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नर हो, न निराश करो मन को

नर हो, न निराश करो मन को नर हो, न निराश करो मन को कुछ काम करो, कुछ काम करो जग में रह कर कुछ नाम करो यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो कुछ तो उपयुक्त करो तन को नर हो, न निराश करो मन को। संभलो कि सुयोग न जाय चला कब

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मधुर मधु-सौरभ जगत्

मधुर मधु-सौरभ जगत् को मधुर मधु-सौरभ जगत् को स्वप्न में बेसुध बनाता वात विहगों के विपिन के गीत आता गुनगुनाता ! मैं पथिक हूँ श्रांत, कोई पथ प्रदर्शक भी न मेरा ! चाहता अब प्राण अलसित शून्य में लेना बसेरा ! -महादेवी वर्मा

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मुझे फूल मत मारो

मुझे फूल मत मारो मुझे फूल मत मारो, मैं अबला बाला वियोगिनी, कुछ तो दया विचारो। होकर मधु के मीत मदन, पटु, तुम कटु गरल न गारो, मुझे विकलता, तुम्हें विफलता, ठहरो, श्रम परिहारो। नही भोगनी यह मैं कोई, जो तुम जाल पसारो, बल हो तो सिन्दूर-बिन्दु यह--यह हरनेत्र निहारो! रूप-दर्प कंदर्प, तुम्हें तो मेरे पति पर

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नील पर कटि तट जटनि दै मेरी आली

नील पर कटि तट जटनि दै मेरी आली नील पर कटि तट जटनि दै मेरी आली, लटुन सी साँवरी रजनि सरसान दै, नूपुर उतारन किंकनी खोल डारनि दै धारन दै भूषन कपूर पान खान दै, सरस सिंगार कै बिहारी लालै बसि करौ बसि न करि सकै ज्यौं आन प्रिय प्रान दै, तौ लगि तू धीर धर एतौ

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मधुशाला

मधुशाला उतर नशा जब उसका जाता, आती है संध्या बाला, बड़ी पुरानी, बड़ी नशीली नित्य ढला जाती हाला, जीवन के संताप शोक सब इसको पीकर मिट जाते सुरा-सुप्त होते मद-लोभी जागृत रहती मधुशाला।। -हरबंश राय बच्चन

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