Saturday, 25 February, 2017
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सोमवार की व्रत कथा

व्रत कथा

कथा के अनुसार   एक नगर में एक धनी व्यापारी रहता था। सबकुछ होने पर भी वह व्यापारी  बहुत दुखी था क्योंकि उस व्यापारी का कोई पुत्र नहीं था।
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दिन-रात उसे एक ही चिंता सताती रहती थी। उसकी मृत्यु के बाद उसके इतने बड़े व्यापार और धन-संपत्ति को कौन संभालेगा।पुत्र पाने की इच्छा से वह व्यापारी प्रति सोमवार भगवान शिव की व्रत-पूजा किया करता था। सायंकाल को व्यापारी शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव के सामने घी का दीपक जलाया करता था।

उस व्यापारी की भक्ति देखकर एक दिन पार्वती ने भगवान शिव से कहा- ‘हे प्राणनाथ, यह व्यापारी आपका सच्चा भक्त है। कितने दिनों से यह सोमवार का व्रत और पूजा नियमित कर रहा है। भगवान, आप इस व्यापारी की मनोकामना अवश्य पूर्ण करें।’
भगवान शिव ने मुस्कराते हुए कहा- ‘हे पार्वती! इस संसार में सबको उसके कर्म के अनुसार फल की प्राप्ति होती है। प्राणी जैसा कर्म करते हैं, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त होता है।’

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पार्वतीजी नहीं मानीं। उन्होंने आग्रह करते हुए कहा- ‘नहीं प्राणनाथ! आपको इस व्यापारी की इच्छा पूरी करनी ही पड़ेगी। यह आपका भक्त है। प्रति सोमवार आपका विधिवत व्रत रखता है और पूजा-अर्चना के बाद आपको भोग लगाकर एक समय भोजन ग्रहण करता है। आपको इसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान देना ही होगा।’
पार्वतीजी  का  इतना आग्रह देखकर भगवान शिव ने कहा- ‘तुम्हारे आग्रह पर मैं इस व्यापारी को पुत्र-प्राप्ति का वरदान देता हूं। लेकिन इसका पुत्र 12  वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहेगा।’
उसी रात भगवान शिव ने स्वप्न में उस व्यापारी को दर्शन देकर उसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया और उसके पुत्र के 12  वर्ष तक जीवित रहने की बात भी बताई।
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भगवान के वरदान से व्यापारी को खुशी तो हुई, लेकिन पुत्र की अल्पायु का सोच के दुःख भी पर फिर भी  व्यापारी पहले की तरह सोमवार का विधिवत व्रत करता रहा। कुछ महीने पश्चात उसके घर सुंदर पुत्र का जन्म  हुआ। पुत्र जन्म से व्यापारी के घर में खुशियां भर गईं। बहुत धूमधाम से पुत्र-जन्म का समारोह मनाया गया।
व्यापारी को पुत्र-जन्म की अधिक खुशी नहीं हुई क्योंकि उसे पुत्र की अल्प आयु के रहस्य का पता था। यह रहस्य घर में किसी को नहीं मालूम था पुत्र का नाम महेश  रखा।

जब महेश 11  वर्ष का हुआ तो शिक्षा के लिए उसे वाराणसी भेजने का निश्चय हुआ। व्यापारी ने महेश  के मामा रायचन्द  को बुलाया और कहा कि महेश  को शिक्षा प्राप्त करने के लिए वाराणसी छोड़ आओ। और जहा जहा विश्राम करो वहा यग करते  ब्राह्मणों को भोजन कराते हुए जाओ  अब महेश  अपने मामा के साथ शिक्षा प्राप्त करने के लिए चल दिया। रास्ते में जहां भी महेश  और रायचंद विश्राम के लिए ठहरते, वहीं यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते थे।

लंबी यात्रा के बाद महेश  और रायचंद  एक नगर में पहुंचे। उस नगर के राजा की कन्या का  विवाह था  निश्चित समय पर बारात आ गई लेकिन वर का पिता अपने बेटे के एक आंख से काने होने के कारण बहुत चिंतित था। उसे इस बात का भय सता रहा था कि कन्या के पिता उस नगर के राजा  को इस बात का पता चलने पर कहीं वह विवाह से इनकार न कर दें। इससे उसकी बदनामी होगी।

वर के पिता ने महेश  को देखा तो उसके मस्तिष्क में एक विचार आया। उसने सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं। विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर में ले जाऊंगा।वर के पिता ने इसी संबंध में महेश  और रायचन्द  से बात की। रायचन्द  ने धन मिलने के लालच में वर के पिता की बात स्वीकार कर ली।महेश  को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी चंद्रिका से विवाह करा दिया गया।

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राजा ने बहुत-सा धन देकर राजकुमारी को विदा करने लगे तब राजकुमारी ने अपनी ओढनी देखि उसमे लिखा था
‘राजकुमारी चंद्रिका, तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ था, मैं तो वाराणसी में शिक्षा प्राप्त करने जा रहा हूं। अब तुम्हें जिस नवयुवक की पत्नी बनना पड़ेगा, वह काना है।’
जब राजकुमारी ने अपनी ओढ़नी पर लिखा हुआ पढ़ा तो उसने काने लड़के के साथ जाने से इनकार कर दिया। राजा ने सब बातें जानकर राजकुमारी को महल में रख लिया। उधर महेश  अपने मामा रायचन्द  के साथ वाराणसी पहुंच गया। महेश  ने गुरुकुल में पढ़ना शुरू कर दिया।
जब महेश  की आयु 12  वर्ष पूरी हुई तो उसने एक यज्ञ किया। यज्ञ की समाप्ति पर ब्राह्मणों को भोजन कराया और खूब अन्न, वस्त्र दान किए। महेश की हालत खराब होने लगी अचानक तो उसने कहा मामा से की मेरी तबियत खराब हो रही है में शयनकक्ष में सोने जा रहा हु । शिव के वरदान के अनुसार शयनावस्था में ही महेश  के प्राण-पखेरू उड़ गए।  मामा ने जब महेश  को मृत देखकर रोने लगा।
मामा के रोने, विलाप करने के स्वर भगवान शिव और माता पार्वती ने भी सुने। पार्वतीजी ने भगवान से कहा- ‘प्राणनाथ! मुझसे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहे। आप इस व्यक्ति के कष्ट अवश्य दूर करें।’
भगवान शिव ने पार्वतीजी के साथ जाकर महेश  को देखा तो पार्वतीजी बोली प्राण नाथ  यह तो उसी व्यापारी का पुत्र है। जिसे आपने  12 वर्ष की आयु का वरदान दिया था। इसकी आयु तो पूरी हो गई।’
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पार्वतीजी ने फिर भगवान शिव से निवेदन किया- ‘हे प्राणनाथ! आप इस लड़के को जीवित करें। नहीं तो इसके माता-पिता पुत्र की मृत्यु के कारण रो-रोकर अपने प्राणों का त्याग कर देंगे। इस लड़के का पिता तो आपका परम भक्त है। वर्षों से सोमवार का व्रत करते हुए आपको भोग लगा रहा है।’ पार्वती के आग्रह करने पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया और कुछ ही पल में वह जीवित होकर उठ बैठा।
शिक्षा समाप्त करके महेश मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया। दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां महेश  का विवाह हुआ था। उस नगर में भी महेश  ने यज्ञ का आयोजन किया। समीप से गुजरते हुए नगर के राजा ने यज्ञ का आयोजन देखा।
राजा ने महेश  को तुरंत पहचान लिया। यज्ञ समाप्त होने पर राजा महेश  और उसके मामा को महल में ले गया और कुछ दिन उन्हें महल में रखकर बहुत-सा धन, वस्त्र देकर राजकुमारी के साथ विदा किया।
रायचन्द ने महेश से कहा की तुम्हारे माता पिता चिंतित होगे में पहले जाकर उन्हें यह सुभ सुचना देता हु  तुम लोग पीछे आओ आराम से

वहां  महेश के माता पिता अपने घर के छत पर जा कर बैठ गए थे की अगर हमारा पुत्र सुरक्षित आया तो हम खुसी खुसी निचे उतर जायेगे वरना यहा से कूदकर प्राण त्याग देगे
जब रायचन्द ने महेश के पिता को सब बतया तो  अपने बेटे के विवाह का समाचार सुनकर, पुत्रवधू राजकुमारी चंद्रिका को देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- ‘हे श्रेष्ठी! मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है।’ व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ।

सोमवार का व्रत जो स्त्री-पुरुष सोमवार का विधिवत व्रत करते और व्रतकथा सुनते हैं उनकी सभी इच्छाएं पूरी होती हैं।

 

हर हर महादेव

 

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